आजादी का अमृत महोत्सव:  

जी हां भारत की आजादी को अब ७५ साल पूरे हो गए हैं। लोग अपनी उम्र या शादी की सालगिरह के विभिन्न पड़ाव को अलग अलग जयन्ती के रूप में मनाते है।  मिसाल के तौर पर २५ वर्षों के लिए रजत जयन्ती , ५० वर्षो के लिए स्वर्ण जयन्ती आदि. इस प्रकरण में पचहत्तरवीं जयन्ती को शायद हीरक जयन्ती या महोत्सव की सज्ञा शायद अधिक उचित होती । आजादी का अमृत महोत्सव के अंदर अमृत शब्द कर्णप्रिय होते हुए भी कुछ अर्थहीन सा प्रतीत होता है.

सहज ही प्रश्न उठते हैं  कि क्या हमारे ये ७५ वर्ष अमृतमय थे या  क्या ये ७५ वां वर्ष अमृतमय है.

चलिए वांग्मय शब्द चर्चा से बाहर निकलते हुए आज पर प्रदार्पण किया जाए।    

नेहरू जी के उस ऐतहासिक भाषण को ७५ वर्ष पूरे हो गए हैं, जिसमें उन्होंने कहा था की "काफी साल पहले, हमने किस्मत के साथ वादा (long years ago we made a tryst with destiny) किया था, और अब समय आ गया है जब हम अपना वादा निभायें, पूर्ण रूप से या अपूर्ण रुप से नहीं वरन्  काफी हद तक निभायें ।" (Not Fully, Not partly but substantially) तब से आजतक का सफर बहुत चुनौतीपूर्ण रहा है.

सन ४७ में जब हमारे founding fathers ने भारत को एक गणतांत्रिक राष्ट्र का जामा पहनाया तब अधिकाँश वैश्विक नेताओं ने भारत के इस गणतान्त्रिक प्रयोग के प्रति अपना संशय जाहिर किया था । गणतंत्र तब तक सिर्फ विकसित देशों का विकल्प रहा था। अतएव भारत सम आर्थिक व सामाजिक रूप से कमजोर और आवश्यक सुविधाओं से वंचित राष्ट्र के लिए गणतंत्र की कल्पना दिवास्वप्न सी प्रतीत होती थी। चर्चिल का बहु उद्धृत संवाद कि “भारत में सत्ता धूर्तों, दुष्टों, हरामखोरों के हाथों में चली जाएगी; सभी भारतीय अक्षम नेता गण तिनके से कमजोर साबित होंगे। वे मीठी जुबान और मूर्ख दिल वाले होंगे। वे सत्ता के लिए आपस में लड़ेंगे और भारत राजनीतिक झगड़ों में खो जाएगा" ने शायद बहुत सारे वैश्विक नेताओं की भावनाओं को प्रतिध्वनित किया था.

गांधी जी ने भी स्वतंत्रता और गणतन्त्र के सामंजस्य को परिभाषित करते हुए कहा था कि "आजादी का सात्विक एवं समुचित अर्थ है कि देश का हर नागरिक हर “गलत” का प्रतिरोध निःशंक भाव से कर सके"। भारतीय सरकार ने भी गांधी जी के 151 वीं वर्षगांठ पर एक website बनाकर तकरीबन ६० हजार लोगो को "मुझ में गांधी " की शपथ लेने के लिए प्रेरित किया। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जिन १५/१६ नागरिकों ने "मुझ में गांधी" के भाव को लेकर सत्य का आह्वान किया आज गांधी सम देशद्रोह के अभियोग में यानि बीमा कोरेगांव मामले में  ४ वर्षौं से कैद में सड़ रहे हैं। पिछले ८ वर्षों में और कुछ हुआ हो या नही जेल में कैदियों की संख्या में काफी  वृद्धि हुई है. और विचाराधीन कैदियों की संख्या में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुयी है.  

आज जब हम आजादी के 75 साल बाद आजादी के समारोह को, अमृत महोत्सव के रूप में मना रहे हैं, विस्मय है कि हमारे कुछ युवा नेता आजादी की मांग कर रहे हैं। तो  १५ अगस्त १९४७ को जो कुछ हासिल हुआ था क्या उसमें कुछ अधूरा रह गया था। जी हाँ, सत्ता पर आसीन लोगों  की चमड़ी का रंग सफेद के बजाये भूरा  हो जाने पर, आम लोगों की जिंदगी में कोई फर्क नहीं पड़ता. फर्क तब पड़ता है जब सत्ता में आम लोगों का दखल और भागीदारी हो।

आज विश्व में लगभग २०० देश हैं।  शायद ही किसी भी देश पर किसी विदेशी शक्ति का परोक्ष रूप से शासन होगा. लेकिन महज विदेशी ताकत को उखाड़ फेंकने से स्वाधीनता भले ही हासिल हो जाए, स्वतंत्रता नहीं हासिल होती।  स्वाधीनता के लिए बाह्य शक्ति से निजात पाना ही पर्याप्त है. लेकिन स्वतंत्रता के लिए तंत्र  में मेरी  यानि  एक आम आदमी की भागीदारी आवश्यक है। उत्तर कोरिया भी पराधीन नहीं है। लेकिन क्या उसके नागरिकों के पास स्वतन्त्रता है। कदाचित नहीं। हमारे तो सविंधान की प्रस्तावाना में ही प्रत्यक्ष  रूप से इस पर बल दिया गया है. वहां इसे लोकतंत्र की संज्ञा दी गयी है। Virtually स्वतन्त्रता और लोकतंत्र में कुछ विशेष अंतर तो दिखाई नहीं देता।

अमृत शब्द से कुछ बहुत मीठा और कुछ बहुत गुणकारी भाव का आभास होता है। क्या महज Rule of Law के नाम पर कानूनी  प्रक्रिया की सजा भोगते हुए लगभग ४ लाख विचाराधीन कैदियों के लिए भी यह आजादी का अमृत काल है। क्या CAA + NRC के आतंक से भयाक्रांत और दोयम दर्जे की नागरिकता भोगते हुए हमारे अल्पसंख्यक नागरिक के अंतःकाल में भी कही कुछ अमृत का आभास हो रहा है। फ्रेंकलिन रूजवेल्ट ने एक बार कहा था कि कोई भी देश लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकता है , जब तक कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों को मान्यता नहीं  देता है।  अल्पसंख्यकों के अधिकारों के प्रति सदाशयता लोकतंत्र की बुनियादी सोच है।

भारत, मानव विकास सूचकांक के अधिकांश मानकों पर निरन्तर नीचे सरक रहा है। फिर चाहे वह गणतन्त्र का मानक हो, या मानवधिकारों का या भूख का या पत्रकारों की सुरक्षा का। हमने हर क्षेत्र में नित नये निम्न स्तर नापे हैं।  

हाल ही में जब कंग्रेस ने महंगाई व बेरोजगारी के विरोध में काले कपड़े पहन दिल्ली में सड़कों पर प्रदर्शन किया तब भाजपा के शीर्ष नेतागणों ने इसे हिन्दु/राम विरोधी और मुस्लिम परस्ती कह कर राजनीति में एक बार फिर धर्म को Force Fit या घुसेड़ दिया। हिन्दु-मुस्लिम  की Binary ही देश के लिये सर्वोच्च कांटे की बात रह गयी है। 

हम गाहे बेगाहे राम या रामराज्य की बातें करते हैं। रामराज्य का ही एक बिम्ब है कि जब भरत वन में राम के पास पहुंचते हैं, और राम भरत से पूछते हैं की क्या वो अल्पसंख्यक अयोध्यावासी  जो वेदों को नही मानते और चार्वाक या बृहस्पति के अनुयायी हैं अपने आपको सुरक्षित महसूस कर रहें  हैं।  गणतंत्र की पहली कसौटी है की वह अल्पसंख्यकों में सुरक्षा का भाव प्रदान करता है या नही।  रूजवेल्ट का संवाद भी रामायण के वाल्मीकि रचित संवाद की पुनरोक्ति ही तो है।

आज जब अमृत काल में हम राम के एक भव्य मंदिर का निर्माण जोरों से कर रहें हैं  तब क्या यह उचित नहीं है कि हम महज नारे बाजी से उबर, रामराज्य को भी सार्थक करने का प्रयास करें, और अल्पसंख्यक समाज में भी एक भय मुक्त माहौल प्रदान करने का प्रयास करें।  अल्पसंख्यक समाज में जुबैर या उमर खालिद की तरह जबरदस्ती की जेल का भय , बुलडोजर से मकान ढहाए जाने का भय, आर्थिक boycott  का भय, पकिस्तान भेज दिये जाने की धमकी का भय एक अलगावपन का भय को हवा देना गलत है। ऐसे भयव्याप्त काल को अमृत काल की संज्ञा देने के पहले इसे भयमुक्त करना आवश्यक है।

मैंने आज से ठीक पच्चीस साल पहले एक प्रयोग किया था. हां वह अमृत काल जैसे अलंकार से आभूषित नहीं था। सन १९९७ ,१५ अगस्त का दिन हमारी आजादी की स्वर्ण जयन्ती थी. मैंने अपने संयुक्त परिवार के सात बच्चों और कुछ वयस्क सदस्यों को परिवार की एक नयी खरीदी हुयी SUV में भर कर रात ११ बजे से रात २ बजे तक कुछ सर्वेक्षण कुछ सैर कुछ आजादी के पचास वर्षों के उत्साह का आस्वादन किया था। मूल उद्देश्य था की बच्चे तब जो काफी छोटे थे यानि कुछ teen aged कुछ उससे भी छोटे को यह आभाष करा सकूं कि वह दिन कुछ ख़ास था कुछ याद रखने लायक था। खैर सैर काफी रोचक रही. हमने सड़क पर मिलाने वाले प्रायः हर शख्स को कागज़ से बने तिरंगे को पकड़ा कर हमारे साथ जोरों से जय हिन्द का नारा बुलंद करने के लिए कहा. किसी भी four wheeler के यात्री ने नारा नही लगाया हाँ two wheeler वालों ने साथ साथ आवाज बुलंद की। कलकत्ते में आकाशवाणी भवन के सामने घूम रहे या किसी VIP का इंतज़ार करते हुए संवाददाताओं से भी इल्तिजा की  जय हिन्द का नारा बुलंद करने के लिए। महज मुस्कुरा कर चल दिए। ट्रैफिक पुलिस से भी आग्रह किया।  उनहोंने बिलकुल सरकारी मुलाजिम की भांति अपने कान बंद कर रखे थे। कोई जवाब नहीं दिया। हाँ ,उन दिनों भारत माता की जय का नारा आज के मानिंद प्रचलित नहीं था और न ही नारा नहीं लगाने से किसी पर देशद्रोह का आक्षेप लगता था। इस अमृत काल में तो पुलिस नागरकों को देशभक्त बनाने एवं भारत माता की जय का नारा लगाने के लिए डंडे का प्रयोग भी बड़े जोश के साथ करती है। अब इस डंडे की सेवा से अगर किसी कमजोर अभियुक्त की मौत हो जाए तो इसे महज collaborative क्षति ही माना जा सकता है। खैर १९९७ में कोई अमृत काल नहीं चल रहा था। और न ही आजके भाति पुलिस का शासन या जोश। अतएव कुछ लोगो ने नारे लगाए कुछ लोगों ने उपेक्षा की इत्यादि। सातों बच्चे जो अब बड़े हो चुके हैं उस दिन को भूले नहीं  हैं। यानि मेरा प्रयास सार्थक था।    

स्वतंत्रता की अवधारणा Nation States के साथ शुरू हुई। सामंती दिनों में राजा और प्रजा थे। एक राजा उतना ही अच्छा या उतना ही बुरा था जितना कि दूसरा। प्रजा का सुख सूचकांक पूरी तरह से राजा की दया पर निर्भर था।

सौभाग्य से, हमारे Founding Fathers यथा, गांधी और नेहरू के पास एक मजबूत "सार्वजनिक विवेक" था और साथी देशवासियों के लिए अत्यधिक सम्मान था। नतीजतन, नियति के साथ हमारी संधि का प्रयास खेती के हल के सामान स्वतः ही लोकतंत्र रूपी  बैल के कंधे पर आ टिका।

लोकतंत्र को उदार और संवादात्मक होना अति आवश्यक है. वरना हमारी आजादी अधूरी है। उदाहरण स्वरूप 1947 में जब एक शरणार्थी शिविर में एक विक्षिप्त शरणार्थी ने नेहरू को कॉलर से पकड़ कर झकझोरते हुए कहा था कि मुझे क्या मिला इस आजादी से। नेहरू ने शांत भाव से उत्तर दिया था, "आप मुझे मेरे कॉलर से पकड़ रहे हैं और मुझसे पूछ रहे हैं कि स्वतंत्रता से आपको क्या मिला । क्या आप नहीं देखते कि राज्य के मुखिया को उसके कॉलर से पकड़  कर जवाब मांगने का आपका यह अधिकार “कुछ है”, यह "कुछ" है, जो आपने स्वतंत्रता अर्जित करके प्राप्त किया है? क्या आप कल वायसराय के साथ भी ऐसा ही कर सकते थे? “

आज एक सहज सोशल मीडिया पोस्ट भी एक व्यक्ति को जेल में डाल सकती है.

नेहरू ने अपनी जेल अवधि 1942-45 के दौरान द डिस्कवरी ऑफ इंडिया लिखी थी। यह भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी भागीदारी की वजह से उन्हें जेल में डाल दिया। इस पुस्तक में, उन्होंने वैदिक काल से शुरू होने वाले भारत के इतिहास और संस्कृति का पता लगाया। नेहरू ने एक स्वतंत्रता सेनानी के प्रिज्म का इस्तेमाल प्राचीन भारत की किरणों और उसके वर्तमान समय तक चलने को अपवर्तित करने के लिए किया।

आज मौजूदा सत्ता एक नया भारत खोजने की कोशिश कर रही है। एक नए भारत का संधान का प्रयास जारी है. इस भारत का इतिहास से कुछ लेना देना नहीं है. एक मिथकीय भारत के जीर्णोदय करने का प्रयास है । वे हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान के और शाकाहारी भारत की खोज कर रहे हैं। उनके अदूरदर्शी दृष्टिकोण के लिए उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता। स्वतंत्रता संग्राम उनके एजेंडे में कभी नहीं था। स्वतंत्रता संग्राम को छोड़ भी दें, तो  भी तिरंगा उनके लिए कभी गौरव का विषय नही रहा। यह हर घर तिरंगा का नारा आरंभिक ५२ वर्षो स्वयं संघ को स्वीकृत नहीं था . इसे स्वीकार करने और इसे नागपुर में अपने मुख्यालय पर फहराने में उन्हें 52 साल लग गए।

हिंदू-मुस्लिम बाइनरी कभी भी एक विदेशी विचार नहीं था। केवल यह निष्क्रिय पड़ा था क्योंकि उसे कोई अनुकूल हवा नहीं मिली थी। वर्तमान पदाधिकारियों ने इसका पोषण किया, इतना शानदार पोषण प्रदान किया की इस Hindu-Muslim बाइनरी ने अपना Hydra  Headed अस्तित्व को  भारत के तमाम हिंदी badlands में एक बहुत अहम् स्थान दिला दिया  है. इस बाइनरी के तहत  दक्षिण पंथी सोच व विचारधारा ने  एक के बाद एक, कई विधानसभा चुनावों में  जीत हासिल की  है. यह बाइनरी फीनिक्स की तरह राख से उठी, और देखते ही देखते द्विधारी तलवार की तरह चुनावी हथियार बन गई है। आज सारे राष्ट्रीय अनुष्ठानों व् संस्थाओं का एकमात्र परिचय सत्ता की राजनीति है. हाल ही में गडकरी जी के कथनानुसार सारी राजनीति का परिचय सत्ता तक आकर सिमट गया है.

गडकरी ने फिर जोर दिया कि राजनीति को समाज में बदलाव लाने का एक साधन होना चाहिए। दुर्भाग्य से आज राजनीति सत्ता के खेल के प्रबंधन का एक विशिष्ट साधन बन गई है।

आज अमृत काल में ८० करोड़ अभावग्रस्त लोगो को मुफ़्त अनाज लगभग २ वर्षों से दिया जा रहा है. यानी ६० % लोगों मुफ़्त में अनाज पा कर अपना पेट भर रहे हैं। जिस देश की लगभग ६० प्रतिशत जनता भूखी हो तो अमृत काल का शब्द जुमले से इतर कुछ भी नहीं  प्रतीत होता।

जब गांधी के उदगार सम, हमारे प्रश्न पूछने के अधिकार को देशद्रोह की संज्ञा ने देकर पद्म पुरस्कार से नवाजा जाएगा वह दिन भारत का अमृत काल होगा। तब आजादी भी सच्ची होगी और किसी कन्हैया कुमार का या कश्मीरी नौजवान का  दोबारा आजादी मांगना बेमानी हो जाएगा।  और इकबाल का गीत साकार हो हममें सारे जहां से अच्छा होने का विचार बिना किसी सरकारी मुहीम के, देश में घर कर लेगा।

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